
कांगड़ा किला (Kangra Fort), कांगड़ा
चित्तौड़गढ़ के विशाल और जौहर की अमर गाथाओं से सराबोर महादुर्ग के वैभव को नमन करने के बाद, आइए अब चलते हैं देवभूमि हिमाचल प्रदेश की शांत वादियों में छिपे एक बेहद प्राचीन, रहस्यमयी और अभेद्य किले की ओर। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित कांगड़ा किला (जिसे स्थानीय भाषा में ‘नगरकोट‘ भी कहा जाता है) हिमालय का सबसे बड़ा और भारत का सबसे पुराना माना जाने वाला किला है। बाणगंगा और माझी नदियों के पावन संगम पर, एक ऊँची चट्टानी पहाड़ी पर बना यह किला केवल राजपूती पराक्रम का ही नहीं, बल्कि अथााह धन-दौलत और विदेशी आक्रमणकारियों के लालच का एक ऐसा ऐतिहासिक केंद्र रहा है जिसने सदियों तक कई बड़े तूफानों को झेला है।
विस्तृत जानकारी (Detailed History) :-
कांगड़ा किले का इतिहास इतना प्राचीन और गौरवशाली है कि इसके प्रमाण महाभारत काल में भी मिलते हैं। मान्यताओं के अनुसार, इस किले का निर्माण महाभारत कालीन त्रिगर्त साम्राज्य के राजा सुशर्मा चंद्र ने कराया था। राजा सुशर्मा चंद्र ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था और युद्ध की समाप्ति के बाद उन्होंने अपनी राजधानी यहाँ स्थानांतरित की और इस अभेद्य दुर्ग का निर्माण कराया। ऐतिहासिक रूप से यह किला कटोच राजवंश के राजपूत राजाओं का गढ़ रहा है, जिन्हें दुनिया के सबसे पुराने जीवित राजवंशों में से एक माना जाता है।
कांगड़ा किले के बारे में इतिहास में एक कहावत बेहद मशहूर थी – “जिसका कांगड़ा किले पर कब्जा, उसका पूरी पहाड़ी रियासत पर कब्जा!” इस किले के भीतर स्थित प्राचीन मंदिरों में अथाह सोना, चांदी और हीरे-जवाहरात जमा थे, जिसके कारण यह हमेशा विदेशी लुटेरों के निशाने पर रहा। इस किले ने अपने इतिहास में 52 बड़े आक्रमण झेले हैं। साल 1009 ईस्वी में महमूद गज़नवी ने इस किले पर आक्रमण कर यहाँ से टन के हिसाब से सोना-चांदी और कीमती रत्न लूटे थे। इसके बाद मोहम्मद बिन तुगलक, फिरोज शाह तुगलक और अंततः मुग़ल सम्राट जहांगीर ने एक लंबे घेरे के बाद 1620 ईस्वी में इस पर अधिकार किया। 18वीं शताब्दी में कटोच वंश के महान शासक महाराजा संसार चंद्र द्वितीय ने मुग़लों को हराकर अपने इस पैतृक किले को वापस हासिल किया। अंत में, यह किला गोरखाओं, सिखों और फिर अंग्रेजों के नियंत्रण में गया। साल 1905 में आए एक विनाशकारी भूकंप ने इस विशाल किले के मुख्य महलों को भारी नुकसान पहुँचाया, जिसके बाद से यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की देखरेख में एक संरक्षित स्मारक है।
बनावट का विवरण (Detailed Architecture) :-
लगभग 4 किलोमीटर के दायरे में फैला यह किला काले और भूरे रंग के मजबूत पत्थरों से बना है। एक ऊँची खड़ी पहाड़ी पर स्थित होने के कारण इसके तीन ओर गहरी खाइयाँ और नदियाँ बहती हैं, जो इसे प्राकृतिक रूप से पूरी तरह सुरक्षित बनाती हैं। इसकी वास्तुकला सैन्य सुरक्षा और प्राचीन शिल्प कला का एक बेजोड़ उदाहरण है।
- सुरक्षात्मक द्वार (The Gateways) :– किले के भीतर प्रवेश करने के लिए एक संकरे और घुमावदार मार्ग से गुजरना पड़ता है, जो दुश्मनों की गति को धीमा करने के लिए बनाया गया था। किले में कई बड़े द्वार हैं, जिनमें अहानी पोल, जहांगीरी गेट, दरीचा गेट और रणजीत सिंह गेट मुख्य हैं। किले का मुख्य प्रवेश द्वार ‘फाटक’ के नाम से जाना जाता है, जो कटोच राजाओं की सुरक्षा व्यवस्था को दर्शाता है।
- लक्ष्मीनारायण और अंबिका देवी मंदिर :– किले के शीर्ष भाग (गढ़) में जाने पर प्राचीन पत्थरों से बने भव्य मंदिरों के अवशेष दिखाई देते हैं। यहाँ स्थित अंबिका देवी मंदिर कटोच राजवंश की कुलदेवी को समर्पित है, जहाँ आज भी श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं। इसके पास ही जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ का एक बेहद प्राचीन मंदिर भी स्थित है, जिसकी नक्काशी देखने योग्य है।
- कपूर सागर कुंड :– किले के भीतर पानी की आपूर्ति के लिए कई प्राचीन बावड़ियां और जलाशय बनाए गए थे, जिनमें से ‘कपूर सागर कुंड’ सबसे मुख्य है। यह गहरा चौकोर तालाब आज भी किले के भीतर पानी के बेहतरीन संचय का उदाहरण है।
- शीश महल और वॉच टावर :– किले के सबसे ऊंचे हिस्से पर राजाओं का निवास स्थान यानी ‘शीश महल’ और महल के प्रांगण बने थे। यद्यपि 1905 के भूकंप में ये क्षतिग्रस्त हो गए, लेकिन यहाँ से पूरी कांगड़ा घाटी, बाणगंगा नदी और दूर बर्फ से ढकी धौलाधार पर्वत श्रृंखलाओं का जो नज़ारा दिखता है, वह अत्यंत विहंगम है।
यात्रा संबंधी जानकारी और पहुँचने का मार्ग (Travel Guide & Routes) :-
टिकट और प्रवेश (Tickets & Entry) :–
- भारतीय नागरिकों के लिए :– ₹25 प्रति व्यक्ति (नकद) या ₹20 (ऑनलाइन/डिजिटल बुकिंग द्वारा)।
- विदेशी नागरिकों के लिए :– ₹300 प्रति व्यक्ति।
- ऑडियो गाइड (Audio Guide) :– किले के प्रवेश द्वार पर कटोच राजवंश के इतिहास को दर्शाने वाली बेहतरीन ऑडियो गाइड उपलब्ध है, जिसका शुल्क लगभग ₹100 से ₹150 होता है।
- फोटोग्राफी शुल्क :– मोबाइल फोन और सामान्य कैमरों से फोटोग्राफी पूरी तरह मुफ्त (Free) है।
समय (Visiting Time) :–
- खुलने का समय :– सुबह 09:00 बजे से शाम 06:00 बजे तक।
- कार्य दिवस :– यह किला वर्ष के सभी 365 दिन पर्यटकों के लिए खुला रहता है। किले की चढ़ाई और इतिहास को समझने के लिए सुबह या देर दोपहर का समय सबसे अच्छा रहता है।
पहुँचने का मार्ग (How to Reach) :–
- सड़क मार्ग/ई-रिक्शा द्वारा :– कांगड़ा किला मुख्य कांगड़ा शहर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। धर्मशाला (20 किमी) और मैकलोडगंज से यहाँ के लिए सीधी टैक्सियाँ और स्थानीय बसें हर समय उपलब्ध रहती हैं। कांगड़ा बाईपास या बस स्टैंड से किले के मुख्य द्वार तक जाने के लिए स्थानीय ऑटो और ई-रिक्शा (e-rickshaw) बहुत आसानी से मिल जाते हैं।
- रेल मार्ग द्वारा :– सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन ‘कांगड़ा मंदिर’ (Kangra Mandir) है, जो एक टॉय ट्रेन (नैरोगेज) स्टेशन है और पठानकोट से जुड़ा है। मुख्य ब्रॉडगेज स्टेशन पठानकोट (लगभग 87 किमी) है, जहाँ से आप कैब या बस के जरिए आसानी से पहुँच सकते हैं।
- हवाई मार्ग द्वारा :– सबसे नजदीकी हवाई अड्डा ‘गग्गल हवाई अड्डा‘ (कंगड़ा हवाई अड्डा) है, जो किले से मात्र 14 किलोमीटर दूर है। यहाँ से किले के लिए सीधे ऑटो या टैक्सी मिल जाती है।
फोटोग्राफी स्पॉट्स (Photography Spots) :–
- जहांगीरी गेट की प्राचीर :– जहाँ से किले के विशाल पत्थर के मेहराब और प्राचीन घुमावदार सीढ़ियाँ एक ऐतिहासिक बैकग्राउंड तैयार करती हैं।
- किले का शीर्ष बिंदु (शीश महल) :– यहाँ से नीचे बहती बाणगंगा और माझी नदियों के संगम और पृष्ठभूमि में विशाल धौलाधार की पहाड़ियों का एक परफेक्ट पैनोरमिक शॉट मिलता है।
- अंबिका देवी मंदिर के नक्काशीदार स्तंभ :– प्राचीन भारतीय शिल्प कला को पोर्ट्रेट फोटोग्राफी के फ्रेम में कैद करने के लिए यह सबसे उत्तम स्थान है।
स्थानीय स्वाद और प्रसिद्ध बाज़ार (Local Food & Shopping) :–
- स्थानीय स्वाद :– कांगड़ा की यात्रा के दौरान पारंपरिक हिमाचली थाली ‘कांगड़ी धाम’ (Kangri Dham) का स्वाद लेना बिल्कुल न भूलें, जिसमें बिना प्याज-लहसुन के चने की दाल, मदरा, खट्टा और मीठे चावल परोसे जाते हैं। इसके अलावा स्थानीय कैफे में सिडू (Sidu) और गरमा-गरम मोमोज का आनंद लें।
- प्रसिद्ध बाज़ार :– किले के पास स्थित ‘कांगड़ा मुख्य बाज़ार’ और ‘धर्मशाला बाज़ार’ प्रसिद्ध हैं। यहाँ से आप कांगड़ा की विश्व प्रसिद्ध ‘कांगड़ा मिनिएचर पेंटिंग्स’ (लघु चित्रकला), हाथ से बुने हुए ऊनी शॉल, हिमाचली टोपियाँ, और कांगड़ा की शुद्ध ऑर्गेनिक ग्रीन-टी खरीद सकते हैं।
दिलचस्प तथ्य (Interesting Facts) :-
- हिमालय का सबसे बड़ा किला :– कांगड़ा किला पूरे हिमालयी क्षेत्र का सबसे विशाल और क्षेत्रफल के लिहाज से भारत का सबसे पुराना जीवित दुर्ग माना जाता है।
- गज़नवी की महालूट :– इतिहासकार बताते हैं कि महमूद गज़नवी ने जब इस किले को लूटा, तो धन की मात्रा इतनी अधिक थी कि उसके पास उसे ले जाने के लिए ऊँट और घोड़े कम पड़ गए थे। इस किले के गुप्त तहखानों में आज भी कई अनसुलझे रहस्य दबे होने की बात कही जाती है।
- महाराजा संसार चंद्र का स्वर्ण काल :– कटोच राजा संसार चंद्र कला के बहुत बड़े पारखी थे। उनके काल में ही विश्व प्रसिद्ध ‘कांगड़ा चित्रकला शैली’ का जन्म हुआ, जिसकी अनूठी कलाकृतियाँ आज भी किले के पास बने संग्रहालय में देखी जा सकती हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर :-
प्रश्न 1:– कांगड़ा किले को इतिहास में ‘नगरकोट’ क्यों कहा जाता था?
उत्तर:- प्राचीन काल में कांगड़ा क्षेत्र को ‘नगरकोट‘ या ‘त्रिगर्त‘ के नाम से जाना जाता था। त्रिगर्त का अर्थ है तीन नदियों (रावी, ब्यास और सतलुज) के बीच का क्षेत्र। इस क्षेत्र का मुख्य प्रशासनिक और सैन्य केंद्र होने के कारण इस किले का नाम नगरकोट पड़ा था।
प्रश्न 2:- कांगड़ा किले के ठीक पास कौन सा मुख्य संग्रहालय स्थित है?
उत्तर:- किले के प्रवेश द्वार के पास ही ‘महाराजा संसार चंद्र संग्रहालय’ (Maharaja Sansar Chand Museum) स्थित है। यह संग्रहालय कटोच शाही परिवार द्वारा चलाया जाता है, जहाँ कांगड़ा शैली की प्राचीन पेंटिंग्स, राजाओं के वस्त्र, चांदी के बर्तन और सदियों पुराने हथियार प्रदर्शित हैं।
प्रश्न 3:- क्या कांगड़ा किले को घूमने के लिए विशेष शारीरिक क्षमता की आवश्यकता है?
उत्तर:- किले का मुख्य मार्ग पत्थरों से बना है और शीर्ष तक जाने के लिए काफी चढ़ाई करनी पड़ती है। हालांकि मार्ग में सीढ़ियाँ और रैंप बने हैं, फिर भी बुजुर्गों और घुटनों की समस्या वाले लोगों को थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए। आरामदायक जूते पहनकर 2 से 3 घंटे में इसे आसानी से घूमा जा सकता है।
“बाणगंगा और माझी नदियों के पवित्र संगम पर काली चट्टानों का सीना ताने खड़ा कांगड़ा का यह प्राचीन दुर्ग, त्रिगर्त साम्राज्य के वैभव और कटोच वीरों के उस अदम्य साहस का साक्षी है जिसके सोने की चमक को इतिहास का कोई भी चक्र धुंधला नहीं कर सका।”
