
विस्तृत जानकारी (Detailed History)
नवरात्रि के नौवें और अंतिम दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। जैसा कि इनके नाम से ही स्पष्ट है, ‘सिद्धि‘ का अर्थ है अलौकिक शक्ति और ‘दात्री‘ का अर्थ है देने वाली। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने इन्हीं देवी की कठिन तपस्या करके आठों सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। माँ सिद्धिदात्री की कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था, जिसके कारण वे लोक में ‘अर्धनारीश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हुए। माँ सिद्धिदात्री न केवल मनुष्यों, बल्कि देव, दानव, गंधर्व और यक्षों को भी सिद्धियाँ प्रदान करने वाली सर्वोच्च शक्ति हैं। इनकी उपासना करने से भक्तों के लिए ब्रह्मांड में कुछ भी पाना असंभव नहीं रह जाता।
बनावट का विवरण (Detailed Architecture)
माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप अत्यंत दिव्य और तेजोमय है। माता की चार भुजाएं हैं। उन्होंने अपने दाहिने ओर की ऊपर वाली भुजा में ‘गदा‘ और नीचे वाली भुजा में ‘चक्र‘ धारण किया हुआ है। बाईं ओर की ऊपर वाली भुजा में उन्होंने ‘कमल का फूल‘ और नीचे वाली भुजा में ‘शंख‘ लिया हुआ है। यद्यपि माँ का वाहन सिंह (शेर) है, लेकिन वे प्रायः कमल के पुष्प पर ही आसीन दिखाई देती हैं। इनका मुखमंडल मंद मुस्कान से सुशोभित है, जो भक्तों को अभय प्रदान करता है। इनका लाल वस्त्र और स्वर्ण आभूषण इनकी भव्यता को और भी बढ़ा देते हैं।
यात्रा संबंधी जानकारी और पहुँचने का मार्ग (Travel Guide & Routes)
माँ सिद्धिदात्री का एक अत्यंत प्राचीन और पौराणिक मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी (काशी) के ‘मैदागिन‘ क्षेत्र में ‘गोलघर‘ के पास स्थित है।
- टिकट :– मंदिर में प्रवेश हेतु कोई शुल्क नहीं है।
- समय :– मंदिर सुबह 5:00 बजे से रात 11:00 बजे तक खुला रहता है। महानवमी के दिन यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
- पहुँचने का मार्ग :–
- हवाई मार्ग :– वाराणसी का लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा मंदिर से लगभग 25 किमी दूर है।
- रेल मार्ग :– वाराणसी जंक्शन (Varanasi Cantt) सबसे नजदीकी मुख्य स्टेशन है। यहाँ से मंदिर तक जाने के लिए ई-रिक्शा और ऑटो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
- सड़क मार्ग :– वाराणसी शहर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा है। ‘मैदागिन‘ चौराहा एक प्रसिद्ध स्थल है, जहाँ से मंदिर की दूरी पैदल तय की जा सकती है।
- फोटोग्राफी स्पॉट्स :– मंदिर के प्राचीन शिखर और बाहरी नक्काशीदार द्वारों के पास फोटोग्राफी के अच्छे विकल्प हैं। मंदिर के अंदर अनुशासन का पालन करना अनिवार्य है।
- स्थानीय स्वाद :– वाराणसी की प्रसिद्ध ‘राबड़ी‘ और ‘लौंगलता‘ का स्वाद चखना न भूलें।
- प्रसिद्ध बाज़ार :– पास में ही ‘बड़ी पियरी‘ और ‘चौक‘ बाज़ार हैं, जहाँ से आप बनारसी शिल्प और साड़ियाँ खरीद सकते हैं।
Interesting Facts
- मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व – ये आठों सिद्धियाँ माँ सिद्धिदात्री की कृपा से ही प्राप्त होती हैं।
- माँ सिद्धिदात्री को ‘केतु’ ग्रह की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, इनकी पूजा से केतु के दुष्प्रभाव शांत होते हैं।
- महानवमी के दिन कन्या पूजन के बाद ही नवरात्रि का व्रत पूर्ण माना जाता है।
- माता को हलवा, पूरी और काले चने का भोग अत्यंत प्रिय है।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर :-
प्रश्न 1:- माँ सिद्धिदात्री की पूजा किस दिन की जाती है?
उत्तर:- माँ सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्रि के नौवें दिन (महानवमी) को की जाती है।
प्रश्न 2:- भगवान शिव का ‘अर्धनारीश्वर’ रूप किस देवी की कृपा से बना?
उत्तर:- भगवान शिव का ‘अर्धनारीश्वर‘ रूप माँ सिद्धिदात्री की कृपा और तपस्या के फल स्वरूप बना।
प्रश्न 3:- माँ सिद्धिदात्री किस पर विराजमान रहती हैं?
उत्तर:- माँ सिद्धिदात्री वैसे तो सिंह की सवारी करती हैं, किंतु वे कमल के पुष्प पर भी विराजमान रहती हैं।
“माँ सिद्धिदात्री की पूर्णता में ही संसार की समस्त सिद्धियाँ निहित हैं, जो भक्त को मोक्ष की ओर ले जाती हैं।”
