
विस्तृत जानकारी :-
माँ दुर्गा के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र ‘कार्तिकेय‘ का एक नाम ‘स्कन्द‘ भी है। स्कन्द (कार्तिकेय) की माता होने के कारण ही इन्हें ‘स्कन्दमाता‘ कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब तारकासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था, तब उसके वध के लिए भगवान शिव के तेज से जन्मे कुमार कार्तिकेय की रक्षा और पालन-पोषण के लिए माता ने यह रूप धारण किया था। स्कन्दमाता वात्सल्य और प्रेम की प्रतिमूर्ति मानी जाती हैं। इनकी उपासना से भक्त को मोक्ष के द्वार प्राप्त होते हैं और उसकी समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं।
बनावट का विवरण (Detailed Architecture)
स्कन्दमाता का स्वरूप अत्यंत दिव्य और शांत है। माता की चार भुजाएं हैं। उन्होंने अपने दाहिने हाथ की ऊपर वाली भुजा में भगवान स्कन्द (बाल रूप) को गोद में बैठाया हुआ है। दाहिने हाथ की नीचे वाली भुजा और बाईं ओर की एक भुजा में उन्होंने कमल का फूल धारण किया हुआ है। माता का चौथा हाथ ‘वरदमुद्रा‘ में है, जो भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करता है। इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र (सफेद) और कांतिवान है। कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण इन्हें ‘पद्मासना देवी’ भी कहा जाता है। माता का वाहन सिंह (शेर) है, जो शौर्य और साहस का प्रतीक है।
यात्रा संबंधी जानकारी और पहुँचने का मार्ग (Travel Guide & Routes)
स्कन्दमाता का सबसे प्रसिद्ध मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी (काशी) में ‘जगतपुरा‘ क्षेत्र में स्थित है।
- टिकट :– मंदिर में प्रवेश निःशुल्क है। विशेष पूजा या आरती के लिए रसीद कटवाई जा सकती है।
- समय :– मंदिर सुबह 5:00 बजे खुलता है और रात 11:00 बजे बंद होता है। नवरात्रि के दौरान यह समय बढ़ाया जा सकता है।
- पहुँचने का मार्ग :–
- हवाई मार्ग :– वाराणसी का लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा निकटतम है।
- रेल मार्ग :– वाराणसी कैंट (Varanasi Junction) मुख्य रेलवे स्टेशन है, जहाँ से मंदिर के लिए ऑटो और टैक्सी उपलब्ध हैं।
- सड़क मार्ग :– वाराणसी शहर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। मंदिर तक पहुँचने के लिए शहर के किसी भी हिस्से से ई-रिक्शा या ऑटो आसानी से मिल जाते हैं।
- फोटोग्राफी स्पॉट्स :– मंदिर के बाहरी परिसर और प्राचीन नक्काशीदार द्वारों पर फोटोग्राफी की जा सकती है, लेकिन गर्भगृह के अंदर मनाही है।
- स्थानीय स्वाद :– वाराणसी की प्रसिद्ध कचौड़ी-सब्जी, जलेबी और लस्सी का स्वाद लेना न भूलें।
- प्रसिद्ध बाज़ार :– मंदिर के पास ही हस्तशिल्प और पूजा सामग्री का बाज़ार है। आप यहाँ से बनारसी साड़ियाँ और लकड़ी के खिलौने खरीद सकते हैं।
Interesting Facts
- स्कन्दमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं, इसलिए इनके चारों ओर एक अलौकिक प्रभामंडल दिखाई देता है।
- इनकी पूजा करने से कुमार कार्तिकेय की पूजा स्वतः ही हो जाती है।
- मोक्ष प्राप्ति के लिए स्कन्दमाता की साधना को सर्वोत्तम माना गया है।
- माता को केले का भोग अत्यंत प्रिय है।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर :-
प्रश्न 1:- स्कन्दमाता की पूजा किस दिन की जाती है?
उत्तर:- स्कन्दमाता की पूजा नवरात्रि के पांचवें दिन की जाती है।
प्रश्न 2:- माता का वाहन क्या है और उन्हें किस नाम से भी जाना जाता है?
उत्तर:- माता का वाहन सिंह है और उन्हें ‘पद्मासना देवी‘ के नाम से भी जाना जाता है।
प्रश्न 3:- स्कन्दमाता को क्या भोग लगाना शुभ माना जाता है?
उत्तर:- स्कन्दमाता को केले का भोग लगाना और ब्राह्मणों को केला दान करना बहुत शुभ माना जाता है।
“माँ स्कन्दमाता की कृपा से अज्ञानी को भी ज्ञान प्राप्त होता है और जीवन में वात्सल्य का आगमन होता है।”
