
रूहानी सुकून और सूफियाना अकीदत का केंद्र :- हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह, दिल्ली (Hazrat Nizamuddin Dargah, Delhi)
विस्तृत जानकारी (Detailed History)
मध्य दिल्ली के व्यस्त और ऐतिहासिक निज़ामुद्दीन पश्चिम इलाके में स्थित हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह (Hazrat Nizamuddin Aulia Dargah) केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहज़ीब, रूहानी सुकून और सूफी मत (Sufism) का सबसे बड़ा वैश्विक केंद्र है। यह पवित्र दरगाह चिश्ती सिलसिले के दुनिया के सबसे प्रसिद्ध सूफी संत हज़रत ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया (1238–1325 ईस्वी) का मज़ार (विश्राम स्थल) है। उन्हें उनके भक्त बड़े प्यार और आदर से ‘महबूब-ए-इलाही‘ (ईश्वर का प्रिय) भी कहते हैं।
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने अपना पूरा जीवन बिना किसी भेदभाव के मानवता की सेवा, प्रेम, भाईचारे और शांति का संदेश देने में समर्पित कर दिया। उनके जीवनकाल में अलाउद्दीन खिलजी और मोहम्मद बिन तुगलक जैसे दिल्ली सल्तनत के कई क्रूर और शक्तिशाली सुल्तान आए, लेकिन ख़्वाजा साहब ने कभी भी राजदरबार का रुख नहीं किया और हमेशा गरीबों के साथ रहना पसंद किया। साल 1325 ईस्वी में उनके निधन के बाद उनकी याद में यहाँ पहली बार एक साधारण मज़ार बनाई गई थी। वर्तमान समय में दिखने वाले इस आलीशान और भव्य दरगाह परिसर का पुनरुद्धार और निर्माण मुख्य रूप से साल 1352-1353 ईस्वी के दौरान तत्कालीन सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुगलक ने करवाया था। इसके बाद के कालखंडों में, विशेष रूप से मुग़ल काल के दौरान, इसमें कई खूबसूरत बदलाव और विस्तार किए गए। आज यह स्थान दुनिया भर के उन लोगों के लिए एक बड़ा सहारा है जो मन की शांति की तलाश में आते हैं।
बनावट का विवरण (Detailed Architecture)
हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह की वास्तुकला इस्लामी और पारंपरिक भारतीय स्थापत्य कला का एक अत्यंत सुंदर और अनूठा मेल है। यह दरगाह एक बेहद तंग लेकिन ऐतिहासिक गलियों के बीच एक बहुत बड़े खुले आंगन (Courtyard) के रूप में स्थित है।
- बाहरी बनावट (Exterior) :– दरगाह की मुख्य इमारत एक चौकोर चबूतरे पर बनी है जिसके ऊपर एक अत्यंत सुंदर और विशाल सफेद संगमरमर का गुंबद (White Marble Dome) बना है। इस गुंबद पर काले रंग की खड़ी पट्टियां (Vertical stripes) बनी हैं, जो इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। गुंबद के शीर्ष पर एक सोने का कलश (Finial) सुशोभित है। मुख्य मज़ार के चारों ओर बहुत ही बारीक और सुंदर संगमरमर की नक्काशीदार जालियाँ (Lattice Screens) लगी हैं, जिनके माध्यम से श्रद्धालु अंदर मज़ार को देख सकते हैं और अपनी मन्नत का पवित्र धागा बांधते हैं। दरगाह के ठीक पास ही एक ऐतिहासिक बावड़ी (Stepwell) भी स्थित है, जिसे हज़रत निज़ामुद्दीन के समय ही बनाया गया था और इसके पानी को बेहद पवित्र माना जाता है।
- आंतरिक बनावट (Interior) :– मज़ार के अंदर जाने पर एक असीम और रूहानी शांति का अनुभव होता है। हज़रत ख़्वाजा साहब की मूल कब्र के चारों ओर शुद्ध चांदी का एक बेहद कीमती और सुंदर जंगला (Silver Railing) बना है। आंतरिक छत पर गाढ़े रंग के मखमली कपड़ों का चंदोवा लगा है और दीवारों पर अरबी भाषा में पवित्र आयतें और सूफी शायरी बेहद खूबसूरती से लिखी गई हैं। मुख्य मज़ार के ठीक सामने ही उनके सबसे प्रिय और प्रसिद्ध शिष्य, महान कवि और संगीतकार हज़रत अमीर ख़ुसरो की मज़ार भी स्थित है। सूफी परंपरा के अनुसार, यहाँ आने वाले श्रद्धालु सबसे पहले अमीर ख़ुसरो की मज़ार पर हाजिरी लगाते हैं और उसके बाद ही मुख्य दरगाह के अंदर जाते हैं। इसके अलावा परिसर में मुग़ल सम्राट शाहजहाँ की बेटी शहज़ादी जहाँआरा बेगम और महान मुग़ल इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी की कब्रें भी बेहद सादगी के साथ बनी हुई हैं।
यात्रा संबंधी जानकारी और पहुँचने का मार्ग (Travel Guide & Routes)
- टिकट और शुल्क :– हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह परिसर में प्रवेश और ज़ियारत (दर्शन) पूरी तरह से निःशुल्क (Free) है। यहाँ किसी भी प्रकार का प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता है। (सावधान रहें कि दरगाह के बाहर की गलियों में फूलों और चादर बेचने वाले आपसे ऊंची कीमत मांग सकते हैं, मोलभाव ज़रूर करें)।
- समय (Visiting Time) :– दरगाह भक्तों और पर्यटकों के लिए सप्ताह के सातों दिन खुली रहती है। इसके खुलने का समय सुबह 5:00 बजे से रात 11:00 बजे तक होता है। वैसे तो यहाँ किसी भी समय जाया जा सकता है, लेकिन दरगाह जाने का सबसे उत्तम समय गुरुवार (Thursday) और शुक्रवार (Friday) की शाम का होता है, क्योंकि इस समय यहाँ की विश्व प्रसिद्ध सूफियाना कव्वाली (Sufi Qawwali) का आयोजन किया जाता है।
- पहुँचने का मार्ग (How to Reach) :–
- मेट्रो द्वारा :– दरगाह पहुँचने का सबसे सुगम और आरामदायक माध्यम दिल्ली मेट्रो है। पिंक लाइन (Pink Line) पर स्थित ‘हज़रत निज़ामुद्दीन मेट्रो स्टेशन’ (Hazrat Nizamuddin Metro Station) सबसे नजदीकी स्टेशन है, जहाँ से दरगाह की दूरी मात्र 1 किलोमीटर है। इसके अलावा वॉयलेट लाइन पर स्थित ‘जंगपुरा मेट्रो स्टेशन’ भी पास ही है। स्टेशन के बाहर से आप पैदल या लोकल ई-रिक्शा द्वारा मात्र 5 मिनट में दरगाह के प्रवेश द्वार तक पहुँच सकते हैं।
- ट्रेन द्वारा :– यदि आप दिल्ली से बाहर से आ रहे हैं, तो ‘हज़रत निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन’ (Hazrat Nizamuddin Railway Station) देश के सबसे बड़े स्टेशनों में से एक है, जो दरगाह से मात्र 1.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
- बस और ऑटो द्वारा :– मथुरा रोड पर स्थित निज़ामुद्दीन पुलिस स्टेशन के पास का बस स्टॉप सबसे नजदीक है, जहाँ से लगभग सभी डीटीसी बसें गुजरती हैं।
- फोटोग्राफी स्पॉट्स :– दरगाह के मुख्य सफेद गुंबद का आंगन से दिखने वाला दृश्य, शाम के समय जलने वाले दीयों और रंग-बिरंगी लाइटों की रोशनी, अमीर ख़ुसरो की दरगाह की नक्काशीदार जालियाँ और कव्वाली के समय झूमते हुए कव्वालों और सूफियों के हाव-भाव फोटोग्राफी के लिए सबसे बेहतरीन माने जाते हैं। ध्यान रहे कि मुख्य मज़ार के अंदर कब्र की क्लोज-अप फोटो खींचना पूरी तरह वर्जित है।
- स्थानीय स्वाद :– निज़ामुद्दीन दरगाह के आसपास की गलियां और पूरा इलाका नॉन-वेज और पारंपरिक मुगलई व्यंजनों (Mughlai Cuisine) के शौकीनों के लिए जन्नत है। दरगाह के बाहर मिलने वाले ‘करीम्स’ (Karim’s) और ‘ग़ालिब कबाब कॉर्नर’ के बड़े-बड़े सीख कबाब, मटन कोरमा, रूमानी रोटी और गरमा-गर्म शाही टुकड़ा पूरी दिल्ली में मशहूर हैं। शाकाहारी लोगों के लिए यहाँ के पास के रेस्टोरेंट्स में अच्छे विकल्प मिल जाते हैं।
- प्रसिद्ध बाज़ार :– दरगाह की मुख्य संकरी गलियों में एक बहुत ही जीवंत पारंपरिक बाज़ार लगता है। यहाँ आपको तरह-तरह के सूफी संगीत के वाद्ययंत्र, सुंदर इत्र (Attar), नक्काशीदार टोपी, सूफी कव्वाली की सीडी/बुक्स, मखमली चादरें और खूबसूरत इस्लामिक हस्तशिल्प बहुत ही कम दामों पर मिल जाएंगे।
आसपास के आकर्षण (Nearby Attractions in Detail)
- हुमायूँ का मकबरा (Humayun’s Tomb) :– दरगाह से मात्र 1 किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) है। यह विशाल और भव्य लाल बलुआ पत्थर का मकबरा मुग़ल स्थापत्य कला की चारबाग शैली का भारत में पहला और सबसे बेहतरीन उदाहरण है, जिससे प्रेरित होकर बाद में ताजमहल बनाया गया था।
- सुंदर नर्सरी (Sunder Nursery) :– हुमायूँ के मकबरे के ठीक बगल में स्थित यह दिल्ली का एक बेहद खूबसूरत, विशाल और ऐतिहासिक हेरिटेज पार्क है। लगभग 90 एकड़ में फैले इस पार्क में मुग़ल काल के कई छोटे मकबरे, सुंदर झीलें, फव्वारे, और सैकड़ों प्रजातियों के पेड़-पौधे व पक्षी मौजूद हैं। यह पिकनिक और शांति से वॉक करने के लिए दिल्ली की सबसे बेहतरीन जगहों में से एक है।
- मिर्ज़ा ग़ालिब की मज़ार (Mirza Ghalib’s Tomb) :– दरगाह परिसर के बिल्कुल पास ही उर्दू और फ़ारसी भाषा के विश्व प्रसिद्ध और महान शायर मिर्ज़ा असदुल्ला ख़ान ‘ग़ालिब’ की मज़ार स्थित है। इसके बगल में ही ग़ालिब अकादमी भी है जहाँ उनके जीवन से जुड़ी दुर्लभ पांडुलिपियां और यादें सुरक्षित रखी गई हैं। इतिहास और शायरी के शौकीनों को यहाँ ज़रूर जाना चाहिए।
- अब्दुल रहीम खान-ए-खाना का मकबरा (Rahim’s Tomb) :– मथुरा रोड पर दरगाह से कुछ ही दूरी पर स्थित यह महान कवि और अकबर के नवरत्नों में से एक, अब्दुल रहीम खान-ए-खाना (रहीम दास जी) का मकबरा है। इस मकबरे की वास्तुकला बेहद भव्य है और हाल ही में इसका बहुत ही सुंदर पुनरुद्धार किया गया है।
रोचक तथ्य (Interesting Facts)
- सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया और उनके सबसे प्रिय शिष्य अमीर ख़ुसरो के बीच इतना गहरा आध्यात्मिक प्रेम था कि जब 1325 ईस्वी में ख़्वाजा साहब का निधन हुआ, तो उनके वियोग में अमीर ख़ुसरो ने भी मात्र 6 महीने के भीतर अपने प्राण त्याग दिए। दोनों की मज़ार आज भी एक ही परिसर में साथ-साथ मौजूद है।
- दरगाह परिसर में होने वाली गुरुवार की शाम की कव्वाली इतनी प्रसिद्ध है कि बॉलीवुड की कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों (जैसे रॉकस्टार फिल्म का गाना ‘कुन फ़या कुन’ और बजरंगी भाईजान का ‘भर दो झोली मेरी’) की वास्तविक शूटिंग और रिकॉर्डिंग इसी पावन दरगाह के प्रांगण में की गई है।
- हज़रत निज़ामुद्दीन चिश्ती सिलसिले के उन महान संतों में से थे जिन्होंने संगीत (शमा या समा) को ईश्वर तक पहुँचने और ध्यान लगाने का एक पवित्र माध्यम माना था। यही कारण है कि यहाँ कव्वाली को एक इबादत (प्रार्थना) की तरह गाया जाता है।
- दरगाह के अंदर बनी राजकुमारी जहाँआरा बेगम की कब्र पर कोई संगमरमर की छत नहीं है, बल्कि वह पूरी तरह से खुली हुई है और उस पर हरी घास उगी हुई है। उनकी वसीयत के अनुसार, उन्होंने लिखवाया था कि “एक गरीब की कब्र पर केवल हरी घास ही उगनी चाहिए, किसी अमीर पत्थर का साया नहीं।”
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर :-
प्रश्न 1:– हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह के अंदर जाने के क्या नियम हैं और क्या महिलाएं अंदर जा सकती हैं?
उत्तर:– दरगाह के भीतर जाने के लिए महिलाओं और पुरुषों दोनों को अपना सिर ढकना (रूमाल, दुपट्टा या टोपी से) अनिवार्य है। महिलाएँ दरगाह परिसर में आ सकती हैं और कव्वाली सुन सकती हैं, लेकिन मुख्य मज़ार के बिल्कुल अंदर जहाँ कब्र स्थित है, वहाँ केवल पुरुषों को जाने की अनुमति है; महिलाएँ बाहर जालियों से दर्शन और दुआ करती हैं।
प्रश्न 2:- दरगाह में कव्वाली किस दिन और किस समय होती है?
उत्तर:– दरगाह में वैसे तो हर रोज शाम को मगरिब (सूर्यास्त) की नमाज़ के बाद हल्की कव्वाली होती है, लेकिन विशेष और भव्य सूफियाना कव्वाली का आयोजन हर गुरुवार (Thursday) को दो सत्रों में (शाम 6:00 से 7:30 बजे और रात 9:00 से 10:30 बजे) किया जाता है।
प्रश्न 3:– क्या दरगाह के अंदर जाने के लिए कोई विशेष पोशाक कोड (Dress Code) है?
उत्तर:– दरगाह एक बेहद पवित्र धार्मिक स्थान है, इसलिए यहाँ पूरे और शालीन कपड़े पहनकर ही जाना चाहिए। शॉर्ट्स, मिनी स्कर्ट या हाफ पैंट पहनकर जाने से बचें। अपने साथ सिर ढकने के लिए एक साफ कपड़ा या स्कार्फ ज़रूर साथ रखें।
लेखक के विचार (Author’s Thoughts) :-
दिल्ली की गगनचुंबी आधुनिक इमारतों, राजनीति की चकाचौंध और सड़कों के शोर-शराबे के बीच, हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह एक ऐसा रूहानी टापू है जहाँ कदम रखते ही आपके दिल का सारा बोझ हल्का हो जाता है। जब गुरुवार की शाम को ढलते सूरज के साथ दरगाह के प्रांगण में सूफियाना कव्वाली के सुर गूंजते हैं और हवा में लोबान व गुलाब के इत्र की खुशबू घुलती है, तो इंसान खुद को खुदा के बेहद करीब महसूस करता है। यहाँ अमीर-गरीब, हिंदू-मुस्लिम का कोई भेद नहीं रह जाता; सब एक ही पंक्ति में बैठकर उस एक मालिक की इबादत में झूमते हैं। एक लेखक और मुसाफिर के तौर पर, मेरा मानना है कि यदि आप दिल्ली के असली रूहानी मिज़ाज को समझना चाहते हैं और संगीत के माध्यम से आत्मा को परमात्मा से जुड़ते हुए देखना चाहते हैं, तो एक शाम निज़ामुद्दीन की इस चौखट पर ज़रूर बिताएं।
“इत्र की खुशबू और कव्वाली के रूहानी सुरों में लिपटी, निज़ामुद्दीन की यह चौखट आज भी हर टूटे हुए दिल को बिना शर्त अपनी पनाह देती है।”
