लाल किला, दिल्ली

विस्तृत जानकारी (Detailed History)

पुरानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला (Red Fort) परिसर के भीतर, सलीमगढ़ किले के मार्ग के समीप स्थित लाल किला की बावली (Red Fort Stepwell) दिल्ली की सबसे अनोखी, ऐतिहासिक और रहस्यमयी बावलियों में से एक है। यह बावली केवल शाहजहाँ के काल की स्थापत्य कला का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह दिल्ली के दो अलग-अलग साम्राज्यों और भारत के स्वतंत्रता संग्राम के खूनी इतिहास की मूक गवाह है।

​इस ऐतिहासिक बावली का इतिहास लाल किले के निर्माण से भी पुराना माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, इस बावली का प्रारंभिक ढांचा 14वीं शताब्दी (तुगलक काल) या 16वीं शताब्दी (शेरशाह सूरी के पुत्र इस्लाम शाह सूरी द्वारा निर्मित सलीमगढ़ किले के समय) में वजूद में आ चुका था। बाद में, जब 1639-1648 ईस्वी के दौरान मुगल सम्राट शाहजहाँ ने लाल किले का निर्माण करवाया, तब इस प्राचीन बावली को लाल किले के परिसर के भीतर शामिल कर लिया गया और इसका सौंदर्यीकरण किया गया।

इस बावली का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील इतिहास वर्ष 1945 से जुड़ा हुआ है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जब ब्रिटिश हुकूमत ने आजाद हिंद फौज (INA – Indian National Army) के महान जनरलों—कर्नल प्रेम सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों और जनरल शाह नवाज खान को बंदी बनाया, तब उन्हें इसी लाल किला की बावली के नीचे बने गुप्त तहखानों और कमरों में कैद करके रखा गया था। यहीं से उन पर प्रसिद्ध ‘लाल किला ट्रायल‘ (Red Fort Trials) चलाया गया था। स्वतंत्रता के बाद, भारतीय सेना के नियंत्रण में होने के कारण यह बावली दशकों तक आम जनता की नजरों से दूर रही, जिसे हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित कर पर्यटकों के लिए खोला गया है।

बनावट का विवरण (Detailed Architecture) :-

​लाल किला की बावली की बनावट दिल्ली की अन्य पारंपरिक बावलियों (जैसे अग्रसेन की बावली या राजों की बावली) से पूरी तरह भिन्न और वास्तुकला का एक अनूठा प्रयोग है।

  • अनोखा ‘L’ आकार का डिज़ाईन :– इस बावली की सबसे बड़ी स्थापत्य विशेषता इसका विशिष्ट ज्यामितीय आकार है। जहाँ दिल्ली की अधिकांश बावलियाँ सीधी और आयताकार हैं, वहीं यह बावली ‘L’ आकार (L-Shaped Stepwell) में बनी हुई है। इसके एक छोर पर सीधे उतरती हुई सीढ़ियाँ हैं, जो अचानक समकोण (Right Angle) पर मुड़कर मुख्य कुएं की ओर जाती हैं।
  • दो अलग-अलग स्थापत्य शैलियों का संगम :– इस बावली के दो मुख्य हिस्से हैं। एक हिस्सा पूरी तरह से वृत्ताकार कुआँ (Circular Well Shaft) है, जो दिल्ली सल्तनत कालीन पत्थरों की वास्तुकला को दर्शाता है। दूसरा हिस्सा सीढ़ियों और मेहराबदार गलियारों का है, जिस पर बाद में मुगलकालीन ईंटों और लाल बलुआ पत्थरों का काम किया गया।
  • आईएनए (INA) के गुप्त कक्ष :– बावली की निचली मंजिलों में सीढ़ियों के दोनों तरफ छोटे-छोटे गुप्त कमरे और बैरक बने हुए हैं। इन कमरों में वेंटिलेशन के लिए छोटे झरोखे हैं। इन्हीं कमरों को ब्रिटिश काल में जेल (Prison Cells) के रूप में बदल दिया गया था, जहाँ आज भी उस दौर की खामोशी और देशभक्ति की गूंज महसूस की जा सकती है।
  • फोटोग्राफी स्पॉट्स (Photography Spots) :– ऐतिहासिक और आर्किटेक्चरल फोटोग्राफी के लिए यह बावली एक अद्भुत स्थान है। ‘L’ आकार के घुमाव के कारण, इसके शीर्ष से नीचे की ओर देखने पर सीढ़ियों और मेहराबों का एक बहुत ही अनोखा और असममित परिप्रेक्ष्य (Asymmetrical Perspective) कैमरे में कैद होता है। इसके अलावा, पुराने लाल पत्थरों की दीवारों पर उग आई हरी घास और मुग़ल शैली के छोटे मेहराब (Arches) ब्लैक एंड व्हाइट और हेरिटेज फोटोग्राफी के लिए बेहतरीन फ्रेम प्रदान करते हैं।

यात्रा संबंधी जानकारी और पहुँचने का मार्ग (Travel Guide & Routes) :-

  • टिकट (Ticket) :– यह बावली लाल किला परिसर के भीतर स्थित है, इसलिए इसके लिए आपको लाल किले का ही मुख्य प्रवेश टिकट लेना होगा। भारतीय नागरिकों के लिए ऑनलाइन टिकट ₹35 (कैश ₹50) और विदेशी पर्यटकों के लिए ₹550 (कैश ₹600) है। बावली को देखने के लिए अलग से कोई टिकट नहीं लगता।
  • समय (Visiting Time) :– लाल किला और यह बावली सुबह 07:00 बजे से शाम 05:30 बजे तक पर्यटकों के लिए खुली रहती है (विशेष नोट: लाल किला सोमवार को बंद रहता है)। बावली घूमने के लिए सुबह 08:30 बजे से 11:00 बजे का समय सबसे अच्छा है, जब धूप हल्की होती है और भीड़ कम होती है।
  • पहुँचने का मार्ग (How to Reach) :
    • मेट्रो द्वारा :– सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन वायलेट लाइन (Violet Line) पर स्थित लाल किला (Lal Quila) मेट्रो स्टेशन है, जो किले के गेट के बिल्कुल सामने है। इसके अलावा येलो लाइन पर स्थित चांदनी चौक (Chandni Chowk) मेट्रो स्टेशन से भी आप पैदल या ई-रिक्शा द्वारा यहाँ पहुँच सकते हैं।
    • रेलवे द्वारा :– पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन (ODR) यहाँ से मात्र 1.5 किलोमीटर और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन (NDLS) लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर है।
    • रोड द्वारा :– आप दिल्ली के किसी भी हिस्से से रिंग रोड या नेताजी सुभाष मार्ग के रास्ते लाल किला आ सकते हैं। लाल किले के सामने पर्यटकों के लिए विशाल और सुरक्षित पार्किंग व्यवस्था उपलब्ध है।
  • आसपास के आकर्षित बिंदु (Nearby Attractions) :– लाल किले के भीतर स्थित संग्रहालय (क्रान्ति मंदिर, दृश्य कला), सलीमगढ़ किला, चांदनी चौक बाज़ार, जामा मस्जिद, और गौरी शंकर मंदिर।
  • स्थानीय स्वाद और प्रसिद्ध बाज़ार (Local Flavors & Famous Markets) :– लाल किले के ठीक सामने विश्व प्रसिद्ध चांदनी चौक बाज़ार है। यहाँ घूमते समय आप ‘परांठे वाली गली’ के मशहूर मुग़लई और शाकाहारी परांठे, ‘नटराज के दही भल्ले’, और पुरानी दिल्ली की प्रसिद्ध कचौड़ी व जलेबियों का स्वाद ले सकते हैं। शॉपिंग के लिए चांदनी चौक (कपड़े और आभूषण) और चोर बाज़ार (रविवार को) बेहद प्रसिद्ध हैं।

रोचक तथ्य (Interesting Facts) :-

  • ​यह दिल्ली की उन चुनिंदा बावलियों में से एक है, जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारत के अंतिम सशस्त्र विद्रोह (आजाद हिंद फौज के मुकदमों) की गवाह रही है।
  • ​चूंकि यह बावली लंबे समय तक सैन्य नियंत्रण (पहले ब्रिटिश सेना और बाद में भारतीय सेना) में रही, इसलिए यह दिल्ली की सबसे सुरक्षित और प्रदूषण से बची रहने वाली बावलियों में से एक है।
  • ​मुगल काल के दौरान इस बावली के पानी का उपयोग केवल बगीचों को सींचने के लिए नहीं, बल्कि लाल किले के भीतर बने प्रसिद्ध ‘हम्माम’ (शाही स्नानघर) की जलापूर्ति के लिए भी किया जाता था।

महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर :-

प्रश्न 1: लाल किला की बावली का आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) से क्या संबंध है?

उत्तर:- वर्ष 1945 में ब्रिटिश सरकार ने आज़ाद हिंद फ़ौज के तीन प्रमुख जनरलों (शाह नवाज़ ख़ान, गुरबख्श सिंह और प्रेम सहगल) को बंदी बनाकर इसी बावली के नीचे बने गुप्त कक्षों में कैद किया था और यहीं उन पर मुकदमा चलाया गया था।

प्रश्न 2: क्या यह बावली शाहजहाँ ने खुद बनवाई थी?

उत्तर:- नहीं, पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार यह बावली शाहजहाँ के काल से भी पुरानी (संभवतः तुगलक या सूरी काल की) है। शाहजहाँ ने लाल किले का निर्माण करते समय इसे अपने परिसर के भीतर शामिल कर इसका जीर्णोद्धार कराया था।

प्रश्न 3: लाल किले के अंदर यह बावली कहाँ स्थित है और क्या वहाँ तक जाना आसान है?

उत्तर:- यह बावली लाल किले के मुख्य परिसर में उत्तर-पूर्वी छोर पर, सलीमगढ़ किले की ओर जाने वाले रास्ते के पास स्थित है। एएसआई के दिशा-सूचक बोर्डों की मदद से यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।

लेखक के विचार (Author’s Thoughts) :-

​लाल किले के दीवान-ए-आम और भव्य महलों की चकाचौंध से थोड़ा आगे बढ़ने पर जब आप इस शांत और गहरी बावली के सामने खड़े होते हैं, तो आपको इतिहास का एक अलग ही चेहरा दिखाई देता है। यह बावली केवल राजाओं के विलास की कहानी नहीं कहती, बल्कि इसके पत्थरों में आज़ाद हिंद फ़ौज के उन वीर जनरलों की सांसें और उनके संघर्ष की दास्तान दर्ज है जिन्होंने भारत माता की आज़ादी के लिए सर्वस्व दांव पर लगा दिया था। स्थापत्य के लिहाज से इसका ‘L’ आकार देखना अपने आप में अद्भुत है। लाल किला आने वाले हर सच्चे देशभक्त और इतिहास प्रेमी को इस खामोश पड़ी बावली की सीढ़ियों के पास आकर हमारे अमर शहीदों को नमन जरूर करना चाहिए।

“लाल किले के भव्य प्राचीर के भीतर छिपी यह ‘L’ आकार की बावली, मुग़ल वास्तुकला की भव्यता और आज़ाद हिंद फ़ौज के वीरों के देशभक्तिपूर्ण संघर्ष का एक अद्वितीय और अमर संगम है।”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Enable Notifications OK No thanks