
दिल्ली के ऐतिहासिक रक्षक :- सम्राट अशोक के ऐतिहासिक स्तंभ (Ashoka Pillars in Delhi)
जब हम दिल्ली के इतिहास की बात करते हैं, तो अमूमन हमारा ध्यान मुग़ल इमारतों या सल्तनत काल के किलों पर जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि दिल्ली के सीने पर ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी का भी इतिहास दर्ज है, जो भारत के महानतम सम्राट अशोक से जुड़ा है। दिल्ली में एक नहीं, बल्कि दो ऐतिहासिक अशोक स्तंभ (Ashoka Pillars) मौजूद हैं। ये स्तंभ दिल्ली के मूल निवासी नहीं थे, बल्कि इन्हें सैकड़ों किलोमीटर दूर से लाकर यहाँ स्थापित किया गया था। आइए इस विस्तृत ब्लॉग में इन प्राचीन, चमकदार और गौरवशाली स्तंभों के इतिहास, उनकी बनावट और उनसे जुड़ी हर महत्वपूर्ण जानकारी को करीब से जानते हैं।
विस्तृत जानकारी (Detailed History)
दिल्ली के इन दोनों अशोक स्तंभों का इतिहास प्राचीन मौर्य साम्राज्य की महानता और मध्यकालीन तुगलक वंश की सनक व सूझबूझ की एक अद्भुत दास्तान है।
- मूल निर्माण :– इन स्तंभों का निर्माण ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी (लगभग 250 ई.पू.) में मौर्य वंश के महान सम्राट अशोक द्वारा करवाया गया था। सम्राट अशोक ने अपने बौद्ध धर्म के प्रचार और लोक-कल्याणकारी संदेशों (धम्म लिपि) को जनता तक पहुँचाने के लिए इन्हें स्थापित किया था।
- दिल्ली कौन लाया और कब? :– ये स्तंभ मूल रूप से दिल्ली में नहीं थे। इन्हें 14वीं शताब्दी (लगभग 1356 ईस्वी) में तुगलक वंश के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक द्वारा दिल्ली लाया गया था। फिरोज शाह तुगलक को प्राचीन कलाकृतियों और अजूबों को इकट्ठा करने का बहुत शौक था।
- दोनों स्तंभों का मूल स्थान :–
- फिरोज शाह कोटला वाला स्तंभ :– यह स्तंभ मूल रूप से टोपरा (अंबाला, हरियाणा) में स्थापित था। इसे बेहद सावधानी से रेशमी कपड़ों में लपेटकर, एक विशाल 42 पहियों की गाड़ी पर रखकर, यमुना नदी के रास्ते नावों के जरिए दिल्ली लाया गया था।
- दिल्ली रिज (हिंदू राव अस्पताल) वाला स्तंभ :– यह स्तंभ मूल रूप से मेरठ (उत्तर प्रदेश) में स्थित था। इसे भी फिरोज शाह तुगलक ही दिल्ली लाया था और अपने शिकारगाह (कुश्क-ए-शिकार) के पास स्थापित किया था।
बनावट का विवरण (Detailed Architecture)
मौर्यकालीन वास्तुकला की सबसे बड़ी विशेषता उनकी पॉलिश और पत्थरों की नक्काशी थी, जो इन स्तंभों में साफ दिखाई देती है।
- एक ही पत्थर से निर्मित (Monolithic) :– ये दोनों स्तंभ ‘मोनोलिथिक‘ हैं, यानी इन्हें किसी जोड़ या ईंटों से नहीं बल्कि एक ही विशाल चूना पत्थर (Chunar Sandstone) को काटकर बनाया गया है। टोपरा से लाए गए स्तंभ की ऊंचाई लगभग 13 मीटर से अधिक है।
- शीशे जैसी चमक (Mural Polish) :– इन स्तंभों पर मौर्य काल की एक विशेष पॉलिश की गई है। सदियों तक खुले आसमान, धूप और बरसात को झेलने के बाद भी आज ये स्तंभ इस तरह चमकते हैं जैसे कि ये लोहे या किसी धातु के बने हों। फिरोज शाह तुगलक भी इसकी चमक देखकर हैरान रह गया था और इसे ‘सुनहरा स्तंभ’ कहता था।
- प्राचीन लिपियाँ :– इन स्तंभों पर सम्राट अशोक के सात मुख्य आदेश ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण (लिखे) हैं। टोपरा वाले स्तंभ की खास बात यह है कि इसी पर बाद में 12वीं सदी में चौहान वंश के राजा विग्रहराज चतुर्थ के तीन लेख भी खुदवाए गए थे।
यात्रा संबंधी जानकारी और पहुँचने का मार्ग (Travel Guide & Routes)
चूंकि ये दो अलग-अलग जगहों पर स्थित हैं, इसलिए दोनों की यात्रा की जानकारी नीचे दी गई है।
1. फिरोज शाह कोटला स्तंभ (विक्रमजीत सिंह सनातन धर्म मार्ग, नई दिल्ली)
- टिकट :– फिरोज शाह कोटला किले के अंदर प्रवेश करने के लिए भारतीय नागरिकों के लिए लगभग ₹20 से ₹25 का टिकट है (ऑनलाइन बुकिंग पर छूट संभव है)।
- समय :– सुबह 10:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक (यह सोमवार को बंद रह सकता है, कृपया स्थानीय स्तर पर पुष्टि करें)।
- मार्ग :– सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन ‘दिल्ली गेट’ (वायलेट लाइन) है। यहाँ से किला पैदल दूरी पर है।
2. दिल्ली रिज स्तंभ (बाड़ा हिंदू राव अस्पताल के पास, उत्तरी दिल्ली रिज)
- टिकट :– यह एक खुला सार्वजनिक स्थल है, यहाँ जाने के लिए कोई टिकट नहीं लगता, यह निःशुल्क (Free) है।
- समय :– यह 24 घंटे खुला है, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से सुबह 7:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक जाना सबसे अच्छा है।
- मार्ग :– सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन ‘पुल बंगाश’ (रेड लाइन) या ‘सिविल लाइंस’ (येलो लाइन) है। वहाँ से आप ऑटो लेकर हिंदू राव अस्पताल के पास स्थित इस स्तंभ तक पहुँच सकते हैं।
फोटोग्राफी स्पॉट्स (Photography Spots)
इतिहास प्रेमियों और फोटोग्राफर्स के लिए ये स्तंभ एक बेहतरीन सब्जेक्ट हैं।
- कोटला किले की पिरामिड नुमा इमारत :– फिरोज शाह कोटला में अशोक स्तंभ को एक तीन मंजिला पिरामिड जैसी पाषाण संरचना के ऊपर स्थापित किया गया है। नीचे के बगीचे से इस पूरी इमारत और ऊपर आसमान छूते स्तंभ का शॉट बेहद भव्य आता है।
- ब्राह्मी लिपि के क्लोज-अप्स :– स्तंभ पर खुदे प्राचीन अक्षरों के क्लोज-अप शॉट्स मैक्रो और हिस्टोरिकल फोटोग्राफी के लिए अद्भुत हैं।
- रिज की हरियाली :– उत्तरी रिज पर स्थित मेरठ वाले स्तंभ के आस-पास घने पेड़ हैं, जहाँ सुबह के समय सूरज की छनकर आती रोशनी के साथ स्तंभ की विंटेज तस्वीरें ली जा सकती हैं।
स्थानीय स्वाद और प्रसिद्ध बाज़ार (Local Food & Famous Markets)
इन दोनों स्थलों के आस-पास दिल्ली का मशहूर खान-पान और शॉपिंग हब मौजूद है।
- स्थानीय स्वाद (Local Food) :–
- दरियागंज और दिल्ली गेट के पास :– फिरोज शाह कोटला के पास दरियागंज का इलाका है जहाँ के मुगलई कबाब, बटर चिकन और पुरानी दिल्ली की मशहूर चाट बेहद करीब है।
- कमला नगर और सिविल लाइंस :– रिज वाले स्तंभ के पास कमला नगर मार्केट है, जहाँ के छोले भटूरे, कचौड़ी और चाट छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
- प्रसिद्ध बाज़ार (Famous Markets) :–
- दरियागंज बुक मार्केट :– यदि आप रविवार को जाते हैं, तो दरियागंज की मशहूर किताबों की पटरी देख सकते हैं।
- कमला नगर मार्केट :– कपड़ों, जूतों और ट्रेंडी फैशन के लिए नॉर्थ कैंपस का सबसे मशहूर बाज़ार।
आसपास के अन्य आकर्षण (Nearby Attractions)
- फिरोज शाह कोटला के पास :– यहाँ राष्ट्रीय बाल भवन, शंकर इंटरनेशनल डॉल्स म्यूजियम और राजघाट (महात्मा गांधी समाधि) बेहद पास हैं।
- दिल्ली रिज के पास :– यहाँ से कुछ ही दूरी पर ‘फ्लैगस्टाफ टॉवर’ (1857 की क्रांति का गवाह) और दिल्ली विश्वविद्यालय का खूबसूरत नॉर्थ कैंपस स्थित है।
Interesting Facts ( रोचक तथ्य )
- सोने का भ्रम :– जब सुल्तान फिरोज शाह ने पहली बार टोपरा में इस स्तंभ को देखा, तो इसकी चमकीली पॉलिश के कारण उसे लगा कि यह सोने से बना है। इसी वजह से इतिहासकारों ने इसे ‘मीनार-ए-ज़रीन’ (सुनहरी मीनार) भी कहा है।
- विस्फोट से टूटना :– मेरठ वाले स्तंभ को जब रिज पर स्थापित किया गया था, तो 18वीं शताब्दी में एक बारूद के विस्फोट के कारण यह टूटकर पांच टुकड़ों में बिखर गया था। बाद में 1867 में ब्रिटिश काल के दौरान इसके टुकड़ों को जोड़कर इसे दोबारा खड़ा किया गया।
- अकबर का कौतूहल :– मुग़ल सम्राट अकबर भी इन स्तंभों पर लिखी लिपि को पढ़ने के लिए बेहद उत्सुक था, लेकिन उस समय कोई भी इस प्राचीन ब्राह्मी लिपि को डीकोड नहीं कर पाया था। इसे पहली बार 1837 में जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर :-
प्रश्न 1:– दिल्ली में कुल कितने अशोक स्तंभ हैं और वे कहाँ हैं?
उत्तर:– दिल्ली में कुल दो अशोक स्तंभ हैं। पहला नई दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर ‘फिरोज शाह कोटला’ किले के अंदर है, और दूसरा उत्तरी दिल्ली के ‘हिंदू राव अस्पताल’ के पास दिल्ली रिज क्षेत्र में है।
प्रश्न 2:– इन स्तंभों को दिल्ली कौन लेकर आया था?
उत्तर:– इन दोनों स्तंभों को 14वीं शताब्दी (1356 ई.) में तुगलक वंश के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक द्वारा टोपरा (हरियाणा) और मेरठ (उत्तर प्रदेश) से दिल्ली लाया गया था।
प्रश्न 3:- अशोक स्तंभ किस पत्थर से बने हैं और इनकी क्या खासियत है?
उत्तर:– ये स्तंभ चुनार के बलुआ पत्थर (Chunar Sandstone) के एक ही टुकड़े से बने हैं। इनकी खासियत इनकी शीशे जैसी मौर्यकालीन पॉलिश और इन पर खुदी ब्राह्मी लिपि है।
प्रश्न 4:– फिरोज शाह कोटला जाने के लिए सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन कौन सा है?
उत्तर:– फिरोज शाह कोटला किले के लिए सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन ‘दिल्ली गेट’ (वायलेट लाइन) है।
लेखक के विचार (Author’s Thoughts)
जब मैं फिरोज शाह कोटला की उस तीन मंजिला पुरानी इमारत के शीर्ष पर खड़े अशोक स्तंभ को देखता हूँ, तो समय का पहिया जैसे पीछे घूम जाता है। यह स्तंभ सिर्फ पत्थर का एक ढांचा नहीं है, बल्कि यह दो अलग-अलग युगों के मिलन की कहानी है—एक तरफ ईसा पूर्व के सम्राट अशोक की शांति और धम्म का संदेश, और दूसरी तरफ मध्यकाल के फिरोज शाह तुगलक का कला के प्रति कौतूहल। यह सोचना भी विस्मयकारी है कि बिना किसी आधुनिक क्रेन या तकनीक के, 2300 साल पुराने इस भारी-भरकम स्तंभ को यमुना के रास्ते सुरक्षित यहाँ लाया गया। आधुनिक और कंक्रीट की इस दिल्ली के बीच, ये स्तंभ मौन रहकर हमें याद दिलाते हैं कि भारत की जड़ें कितनी गहरी, सहिष्णु और गौरवशाली रही हैं। पत्थरों की यह चमक हमें हमारे भीतर के गौरव को चमकाने की प्रेरणा देती है।
“सैकड़ों मील का सफर तय कर दिल्ली के आसमान को चूमते सम्राट अशोक के ये स्तंभ, बीते दो हजार सालों के इतिहास की गवाही देते हुए आज भी भारत के गौरवशाली धम्म की चमक बिखेर रहे हैं।”
