
चित्तौड़गढ़ किला (Chittorgarh Fort), चित्तौड़गढ़
कुंभलगढ़ के गगनचुंबी महादुर्ग और उसकी 36 किलोमीटर लंबी विशाल दीवार के वैभव को देखने के बाद, आइए अब रुख करते हैं राजपूती शौर्य, बलिदान, भक्ति और जौहर की उस अमर भूमि का, जिसे ‘राजस्थान का गौरव’ और ‘सभी किलों का सिरमौर’ कहा जाता है। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित चित्तौड़गढ़ किला भारत का सबसे बड़ा किला परिसर है। गंभीरी और बेड़च नदियों के किनारे, एक विशाल पहाड़ी पर स्थित यह किला केवल पत्थरों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह राजपूती वीरांगनाओं के जौहर की आग, महान योद्धाओं के खून और अनन्य भक्ति की खुशबू से महकती एक पवित्र ऐतिहासिक धरोहर है। साल 2013 में यूनेस्को (UNESCO) ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था।
विस्तृत जानकारी (Detailed History) :-
चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास इतना प्राचीन है कि इसके तार महाभारत काल से जुड़ते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस किले का निर्माण महाभारत के बलशाली भाई भीम ने कराया था, जिन्होंने यहाँ अपनी गदा मारकर एक तालाब बनाया था जिसे आज ‘भीमलता तालाब‘ कहा जाता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस किले का निर्माण 7वीं शताब्दी में मौर्य वंश के राजा चित्रांगद मोरी ने कराया था और उन्हीं के नाम पर इसका नाम ‘चित्रकूट‘ पड़ा, जो समय के साथ बदलकर ‘चित्तौड़गढ़’ हो गया। साल 734 ईस्वी में गुहिल (गहलोत) वंश के संस्थापक बप्पा रावल ने मौर्य राजा को पराजित कर इस किले पर अधिकार किया और इसे मेवाड़ की राजधानी बनाया।
चित्तौड़गढ़ का इतिहास भारत में सबसे अधिक रक्त रंजित और त्याग से भरा रहा है। इस किले ने अपने इतिहास में तीन सबसे बड़े और विनाशकारी ‘साके’ और ‘जौहर’ देखे हैं।
- पहला जौहर (1303 ईस्वी) :– जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी (पद्मावती) को पाने के लिए किले पर आक्रमण किया। तब राजा रतन सिंह और उनके सेनापति गोरा-बादल ने वीरगति प्राप्त की और रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16,000 राजपूत महिलाओं ने धधकती आग में कूदकर जौहर किया।
- दूसरा जौहर (1535 ईस्वी) :– जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने आक्रमण किया। तब रानी कर्मावती के नेतृत्व में हजारों महिलाओं ने जौहर का रास्ता चुना और शिशु उदय सिंह को ‘पन्ना धाय’ ने अपने बेटे का बलिदान देकर बचाया था।
- तीसरा जौहर (1567-68 ईस्वी) :– जब मुग़ल सम्राट अकबर ने किले को घेरा। तब जयमल और पत्ता जैसे महान वीरों ने असाधारण वीरता दिखाते हुए केसरिया किया और पत्ता की पत्नी रानी फूलकंवर के नेतृत्व में जौहर हुआ। इसके बाद महाराणा उदय सिंह ने उदयपुर की स्थापना की और राजधानी को वहां स्थानांतरित किया।
बनावट का विवरण (Detailed Architecture) :-
लगभग 700 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला यह किला जमीन से करीब 180 मीटर ऊँची एक पहाड़ी पर स्थित है। पहाड़ी का आकार एक विशाल मछली (whale) जैसा दिखाई देता है। इसकी वास्तुकला सैन्य सुरक्षा और प्राचीन शिल्प कला का बेजोड़ नमूना है।
- सात सुरक्षात्मक द्वार (The Seven Gates) :– किले के भीतर पहाड़ी पर ऊपर जाने के लिए सात बेहद मजबूत और घुमावदार द्वारों को पार करना होता है। इन्हें पाडन पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ा पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल कहा जाता है। मुख्य द्वारों के पास ही युद्ध में शहीद हुए वीर जयमल और पत्ता की छतरियां (स्मारक) बनी हुई हैं।
- विजय स्तंभ (Vijay Stambha) :– यह किले की सबसे प्रसिद्ध और आकर्षक संरचना है। महाराणा कुंभा ने मालवा और गुजरात के सुल्तानों पर मिली अपनी ऐतिहासिक जीत की याद में साल 1448 में इसका निर्माण कराया था। 9 मंजिला और 37.19 मीटर ऊँचा यह स्तंभ बारीक नक्काशी और हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों से सजा है, जिसके कारण इसे ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश’ भी कहा जाता है।
- कीर्ति स्तंभ (Kirti Stambha) :– यह 22 मीटर ऊँचा एक 7 मंजिला स्तंभ है, जिसका निर्माण 12वीं शताब्दी में एक जैन व्यापारी जीजा शाह ने कराया था। यह प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को समर्पित है और दिगंबर शैली की खूबसूरत नक्काशी से सुसज्जित है।
- राणा कुंभा महल और पद्मिनी महल :– राणा कुंभा महल किले का सबसे प्राचीन हिस्सा है, जहाँ कभी मीराबाई रहती थीं और इसी के भूमिगत तहखानों में रानी पद्मिनी ने पहला जौहर किया था। दूसरी ओर, पद्मिनी महल एक सुंदर जल महल के रूप में बना है, जिसके केंद्र में स्थित मंडप और कांच के प्रतिबंबों की कहानी अलाउद्दीन खिलजी के प्रसंग से जुड़ी है।
- मीरा मंदिर और कुंभ श्याम मंदिर :– मीराबाई के आराध्य भगवान कृष्ण को समर्पित मीरा मंदिर इंडो-आर्यन शैली में बना एक बेहद पवित्र और सुंदर स्थान है, जहाँ आज भी भक्ति की गूंज महसूस होती है।
- जलाशय और जल स्रोत :– इस किले की सबसे अद्भुत विशेषता इसका वाटर मैनेजमेंट था। कभी इस किले के भीतर 84 छोटे-बड़े तालाब, कुएं और बावड़ियां थीं, जिनमें से ‘गौमुख कुंड’ सबसे पवित्र और मुख्य है, जहाँ चट्टान के बीच से गाय के मुख के आकार के स्रोत से लगातार प्राकृतिक पानी बहता रहता है।
यात्रा संबंधी जानकारी और पहुँचने का मार्ग (Travel Guide & Routes) :-
टिकट और प्रवेश (Tickets & Entry) :–
- भारतीय नागरिकों के लिए :– ₹40 प्रति व्यक्ति (नकद) या ₹35 (ऑनलाइन/डिजिटल बुकिंग)।
- विदेशी नागरिकों के लिए :– ₹600 प्रति व्यक्ति।
- फोटोग्राफी शुल्क :– मोबाइल फोन और सामान्य कैमरों से फोटोग्राफी पूरी तरह मुफ्त (Free) है।
- लाइट एंड साउंड शो :– शाम के समय कुंभा महल परिसर में होने वाले शो के लिए ₹100 प्रति व्यक्ति का टिकट होता है।
समय (Visiting Time) :–
- खुलने का समय :– सुबह 09:00 बजे से शाम 06:00 बजे तक।
- कार्य दिवस :– यह किला वर्ष के सभी 365 दिन पर्यटकों के लिए खुला रहता है। चूंकि यह किला बहुत विशाल है, इसलिए इसे सुबह के समय देखना सबसे आरामदायक रहता है।
पहुँचने का मार्ग (How to Reach) :–
- रेल मार्ग द्वारा :– चित्तौड़गढ़ जंक्शन (Chittor Junction) पश्चिमी रेलवे का एक मुख्य स्टेशन है, जो दिल्ली, जयपुर, कोटा, उदयपुर और मुंबई से सीधे जुड़ा हुआ है। स्टेशन से किले की दूरी मात्र 5 किलोमीटर है।
- सड़क मार्ग/ई-रिक्शा द्वारा :– चित्तौड़गढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग 79 (NH-79) और गोल्डन क्वाड्रिलैटरल पर स्थित है, जिससे सड़क मार्ग बेहद सुगम है। यह उदयपुर से मात्र 115 किलोमीटर दूर है। बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन से किले के ऊपर मुख्य स्मारकों तक जाने के लिए स्थानीय ऑटो और ई-रिक्शा (e-rickshaw) बहुत आसानी से मिल जाते हैं। किले के भीतर घूमने के लिए ऑटो को पूरे दिन के लिए किराए पर लेना सबसे अच्छा विकल्प है।
- हवाई मार्ग द्वारा :– सबसे नजदीकी हवाई अड्डा उदयपुर का ‘महाराणा प्रताप हवाई अड्डा‘ (डबोक) है, जो यहाँ से करीब 90 किलोमीटर दूर है, जहाँ से सीधी टैक्सियाँ उपलब्ध हैं।
फोटोग्राफी स्पॉट्स (Photography Spots) :–
- विजय स्तंभ का पूरा फ्रेम :– इसके ठीक सामने के बगीचे से ऊपर की ओर देखते हुए लिया गया शॉट इसकी भव्यता को बखूबी दर्शाता है।
- गौमुख कुंड :– जहाँ पानी के कुंड के पीछे किले के पत्थरों के ऊंचे मेहराब और प्राचीन मंदिरों का सुंदर प्रतिबिंब (Reflection) दिखाई देता है।
- पद्मिनी पैलेस (जल महल) :– पानी के बीचों-बीच स्थित महल की परछाई और शांत वातावरण लैंडस्केप फोटोग्राफी के लिए जादुई फ्रेम तैयार करते हैं।
स्थानीय स्वाद और प्रसिद्ध बाज़ार (Local Food & Shopping) :–
- स्थानीय स्वाद :– चित्तौड़गढ़ घूमने के दौरान यहाँ के स्थानीय ढाबों पर शुद्ध देसी घी से बनी राजस्थानी दाल-बाटी-चूरमा, मक्के की राब, और प्याज की कचौड़ी का स्वाद जरूर लें। यहाँ मिलने वाली लस्सी और मावे की पेड़े भी काफी पसंद किए जाते हैं।
- प्रसिद्ध बाज़ार :– किले की तलहटी में स्थित ‘सदर बाज़ार’, ‘राणा सांगा बाज़ार’ और ‘फोर्ट रोड बाज़ार’ मुख्य हैं। यहाँ से आप चित्तौड़गढ़ की विश्व प्रसिद्ध ‘अकोला प्रिंट’ (दबू प्रिंट) के कपड़े, लकड़ी के नक्काशीदार खिलौने, पारंपरिक राजस्थानी मोजरियाँ, और हाथ से बने ऊँट के चमड़े के सामान खरीद सकते हैं।
दिलचस्प तथ्य (Interesting Facts) :-
- भारत का सबसे बड़ा किला :– लगभग 700 एकड़ (2.8 वर्ग किलोमीटर) के क्षेत्र में फैले होने के कारण इसे क्षेत्रफल के लिहाज से भारत और एशिया के सबसे विशालकाय किलों में प्रथम स्थान प्राप्त है।
- पानी का अद्भुत संचय :– मुग़ल काल में इस किले के भीतर इतना पानी जमा किया जा सकता था कि यदि 50,000 की सेना भी किले के अंदर 4 साल तक बिना बाहर जाए रहे, तो भी पानी कभी खत्म नहीं होता था।
- अमर छतरियां :– किले के भैरव पोल और हनुमान पोल के बीच आज भी वीर जयमल और पत्ता की ऐतिहासिक छतरियां बनी हुई हैं, जिनके पराक्रम से प्रभावित होकर स्वयं मुग़ल सम्राट अकबर ने आगरा के किले के मुख्य द्वार पर इनकी हाथी पर सवार संगमरमर की मूर्तियां लगवाई थीं।
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर :-
प्रश्न 1:– चित्तौड़गढ़ किले के बारे में “गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया” क्यों कहा जाता है?
उत्तर:- यह राजस्थानी लोककथाओं की एक बेहद प्रसिद्ध पंक्ति है। इसका अर्थ है कि यदि वास्तव में कोई संपूर्ण और विशाल किला है, तो वह केवल चित्तौड़गढ़ है, बाकी सभी किले उसके सामने छोटे और साधारण (गढ़ैया) प्रतीत होते हैं। इसकी विशालता, इतिहास और त्याग अतुलनीय है।
प्रश्न 2:- चित्तौड़गढ़ किले को पूरा घूमने में कितना समय लगता है?
उत्तर:- चूंकि यह किला 7 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है, इसलिए इसे पैदल घूमना संभव नहीं है। ऑटो या अपनी गाड़ी के जरिए इसके सभी 7 द्वारों, विजय स्तंभ, पद्मिनी महल, मीरा मंदिर और कुंडों को अच्छी तरह देखने के लिए कम से कम 4 से 5 घंटे का समय आवश्यक है।
प्रश्न 3:– चित्तौड़गढ़ घूमने का सबसे अच्छा मौसम कौन सा है?
उत्तर:- राजस्थान के अन्य हिस्सों की तरह यहाँ भी गर्मियों में अत्यधिक तापमान होता है। इसलिए यहाँ घूमने के लिए अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे सुहावना और आरामदायक माना जाता है। मानसून के समय (जुलाई से सितंबर) भी यहाँ की पहाड़ियां हरी-भरी हो जाती हैं और नज़ारा बेहद खूबसूरत दिखता है।
“त्रिकूट और अरावली की छाती पर 700 एकड़ में फैला चित्तौड़गढ़ का यह महादुर्ग, पत्थरों पर उकेरी गई राजपूती वीरता की वो अमर गाथा है जहाँ की मिट्टी आज भी रानी पद्मिनी के त्याग और मीराबाई की अनन्य भक्ति की खुशबू से महकती है।”
